श्रीनिवास पाण्डेय का ब्लॉग: मानव, विकास और पर्यावरण

श्रीनिवास पाण्डेय का ब्लॉग: मानव, विकास और पर्यावरण

 श्रीनिवास पाण्डेय

लेखक वाराणसी से हैं और विजय राजहंस मानव सेवा संस्थान के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष।

आज जब एक प्रगतिशील देश, राज्य और समाज की बात होती है तो मानव का जिक्र होना स्वाभाविक है। मानव जनकदाता है प्रगतिशील समाज का, लेकिन मानव की विकास क्रिया में हमारा पर्यावरण बिगड़ गया है। आज पर्यावरण का इस तरह से बिगड़ना एक चिंतनीय विषय है। पर्यावरण का बिगड़ना और विकास की पटकथा लिखना एक ही सिक्के के पहलू है। जिस तरह से पर्यावरण बिगड़ा है, उसी तरह मानव का अस्तित्व खतरे में आया है। आइये एक नजर डालते हैं, मानव के विकास की कहानी पर। जब हमने रेलवे को विकसित किया तो अंधाधुंध पेड़ों की कटाई की और जंगल को काटते गए, जिसका परिणाम हुआ कि हमारा जंगल सिकुड़ता गया। 

पर्यावरण के बिगड़ने से हम ने सर्प्रथम जिवाणुओं को देखा, उनसे फैली बीमारी जैसे प्लेग ने 17वीं शताब्दी में मानव को खतरे में डाल दिया। 25 करोड़ जनसंख्या को अपनी चपेट मे ले कर उन्हें मार दिया। अब मानव अस्तित्व खतरे में आ गया है, लेकिन मानव कहा मानेने वाला। उसने निरन्तर प्रयास से उसकी दवा बना ली, फिर विकास का पहिया चला मानव ने हथियार और बम का जखीरा खड़ा कर लिया और कई देशों की महत्वकांक्षा ने विश्व को युद्ध में झोंक दिया। 20वीं शताब्दी में दो युद्ध को विश्व ने स्वीकार किया। 1945 में अमरीका ने जापान में दो परमाणु बम गिरा कर जापान को तहस-नहस कर दिया। आज भी जापान के लोग उस त्रासदी का दंश झेल रहे ये सभी विकास की परिभाषा को सिद्ध करते है। 

मानव ने विकास कर आज चांद तक का सफर तो  तय कर लिया साथ ही पर्यावरण को खंडित कर अपनी बर्बादी की पटकथा भी तैयार की। 2019 में कोरोना का आना और 2020 में मानव को विवश कर दिया कि वो घर पर ही रहे। ये विकास का सुफल था, आज हम को सोचना होगा कि क्यों हम विकास की दौड़ में खुद अपने हाथ की कठपुतली बन गये है। इस अंधी दौड़ में पर्यावरण को भी सुरक्षित रखना हमारा काम है, तभी हम सुरक्षित रहेंगे। ये सब महामारी का प्रकोप पर्यावरण को खंडित करने का सुफल है। आज पर्यावरण को सुरक्षित करना ही होगा, तभी हम इस प्रकार की आपातकालीन बीमारियों, जो मानव के अस्तित्व के लिये खतरा हैं से बच सकते हैं। मानव ने विकास की जो एक नींव तैयार की है उसे सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाना होगा। आज जब देश ने पहले लॉकडाउन को झेला, मानव, पशु-पक्षी की तरह कैद होकर रह गया, उसकी सब गतिविधि बंद हो गयीं। प्रकृति अपने मूल स्वरूप में आ गयी, वो खिल उठी, हमारी निर्मल गंगा खिल उठी और चिड़या चहचहाने लगी, पेड़ मुस्कराने लगे। ये शताब्दी बाद हुआ, जो ऐसे दृश्य को मानव ने आत्मसात किया। हमको विकास की रूपरेखा तो तैयार करनी है, साथ ही हम को पर्यावरण का मूल स्वरूप भी सुरक्षित रखना होगा।