सेक्स का चूल्हा, प्रेम की हांडी

सेक्स का चूल्हा, प्रेम की हांडी

प्रेम का कोई ख़ास दिन नहीं होता। उसे बाजार में बिकने वाले कार्ड्स और उपहारों की मदद से व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह कोई ऐसे वस्तु नहीं जिसे हाट में बेचा-खरीदा जा सके। यह एक गहरी समझ पर, एक दूसरे के प्रति हमारी जिम्मेदारी के अहसास पर, पूरे समाज के प्रति हमारे प्रेम पर आधारित होता है। यह व्यक्तिगत सुख और आनंद के लिए गुनगुनाहट भरी रजाई में दुबक जाने का अवसर मात्र नहीं। एक स्तर पर यह संवेदनाओं का विनिमय जरुर है, भावनात्मक, दैहिक और मानसिक, पर एक दूसरे स्तर पर यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी है। इसीके मद्देनज़र ग़ालिब ने इसे ‘आग का दरिया’ और मीर ने ‘भारी पत्थर’ कहा है। इसे जीना कोई आसान काम नहीं। यह एक गहरी प्रतिबद्धता है, यह आत्मविस्मृति और व्यक्तिगत हानि-लाभ से ऊपर उठने की क्षमता की परीक्षा है। 

स्त्री पुरुष के रिश्तों में सेक्स और प्रेम के बीच की विभाजन रेखा बारीक तो हमेशा रही है, पर समय के साथ तो यह बिलकुल धूमिल और अस्पष्ट होती जा रही है। गौर से देखें तो प्रेम का अभाव और सेक्स की अदम्य भूख, हवस और दैहिक सुख की बेकाबू कामना के कारण हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक रिश्ते एक जटिल समस्या में तब्दील हो गए हैं। हर चालीस मिनट में इस देश में एक बलात्कार होता है। इस तरह की घटनाओं का बार-बार होना हमें इसके प्रति असंवेदनशील तो बना ही दे रहा है, साथ ही यह बता रहा है कि कहीं कुछ गंभीर रूप से दूषित और रुग्ण है हमारे रोज़मर्रा के जीवन में; सेक्स के बारे में हमारी समझ और जीवन में स्नेह की जरुरत को लेकर। स्त्री पुरुष के सम्बन्ध यदि ‘सही’ न हों, उनमे स्नेह और सम्मान, मैत्री और प्रेम ख़त्म हो जाए तो सेक्स हावी हो जाता है, सब कुछ सेक्स के इर्द-गिर्द केन्द्रित हो जाता है। बाकी चीज़ें कमतर होकर पृष्ठभूमि में चली जाती हैं। प्रेम में सेक्स शामिल है, पर प्रेम रहित सेक्स की एक बड़ी समस्या हमारे सामने है। यही एक मुख्य कारण है कि सिर्फ सिर्फ सेक्स के सुख की तलाश में शुरू होने वाले प्रेम की उम्र बहुत कम होती है। प्रेम का गहरा और वास्तविक सुख है सच्ची मित्रता में। सेक्स का सम्बन्ध एक ख़ास दैहिक उम्र और एक ख़ास किस्म की मनोवैज्ञानिक अवस्था के साथ है। जब वह उम्र बीत जाए, और वह मानसिक अवस्था बीत जाए, तो सम्बन्ध एक बोझ बन जाता है, जैसा कि अक्सर होता है। प्रेम उत्तेजना भर नहीं; यह एक गहरा अहसास है, एक गहरी अनुभूति, और करुणा इसका एक अभिन्न अंग है। दैहिक उत्तेजना की तलाश करुणा को ख़त्म कर सकती है, और साथ ही प्रेम को भी। गौतम बुद्ध एक बार एक विवाह समारोह में गए; लोगों को यह भरोसा ही नहीं था कि वह विवाह में शामिल होंगें, क्योंकि वह एक संन्यासी थे। पर बुद्ध वहां गए, और नव-विवाहित दम्पति को आशीर्वाद देते समय उन्होंने कहा: “जिस तरह तुम लोगों ने एक दूसरे के साथ विवाह किया है, ठीक वैसे ही सत्य के साथ भी विवाह कर लो”। उनका स्पष्ट अर्थ यही था, कि विवाह और प्रेम किसी अस्थायी उत्तेजना और सुख को उद्येश्य बना कर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उसका उद्येश्य होना चाहिए प्रेम के वास्तविक सत्य का पता लगाना। ऐसे ही सम्बन्ध टिक पाते हैं और आखिर तक उनकी खूबसूरती बनी रहती है। जहाँ सेक्स ही लक्ष्य हो जाता है, वहां उसकी लम्पट लपट पर प्रेम की हांडी बार-बार कहाँ चढ़ पाती है!           

प्रेम आपको बहुत अधिक कोमल, समझदार और सजग बनाता है अपने पति, पत्नी, प्रेमी, प्रेमिका और मित्र के प्रति। बहुत गहरा भाव है प्रेम का। पर जो बलात्कार करता है, जो अपनी पत्नी से बगैर उसकी मर्जी के सम्भोग करता है, या जो स्त्री भी किसी की मजबूरी का लाभ उठा कर, लोभ वगैरह का सहारा लेकर किसी पुरुष का इस्तेमाल करती है, तो ऐसे संबंधों में प्रेम कहीं नहीं होता। यहाँ तो उत्तेजना पैदा करने वाला आकर्षण होता है, और उसकी उम्र ज्यादा नहीं होती। इस उत्तेजना की खोज हिंसा, क्रूरता और असंवेदनशीलता को जन्म देती है।

आधुनिक जीवन के दबाव, संपन्न वर्ग में हर चीज़ का आसानी से उपलब्ध होना, रोज़ के तनाव और कई तरह के कामों के जाल में फंसा मन पलायन ढूँढने में लगा होता है। वीकेंड का इंतज़ार वह सोमवार से ही करने लगता है। हर अवकाश उसके लिए राहत का अवसर होता है। सेक्स से ज्यादा राहत उसे किसी चीज़ में मुहैया नहीं होती। हमने टेक्नोलॉजी, और वर्चुअल दुनिया की उपस्थिति में हर तरह के ‘सुख’ का ‘अनुभव’ कर लिया है। छोटी उम्र के बच्चे भी अब जानकार हैं। जानकारियों का विस्फोट हर पल हो रहा है और उनकी ध्वनि हर मध्यम वर्ग के साधारण आर्थिक स्थिति वाले बच्चे तक भी पहुँच रही है। जीवन में बहुत छोटी उम्र में ही बच्चे ‘सब कुछ’ समझ चुके होते हैं। उनमे से कई बच्चे अनेक तरह के सुख का अनुभव भी कर चुके होते हैं।

सत्तर और अस्सी के दशक में हमारे मनोरंजन की यात्रा धूल-धक्कड़ में खेलने कबड्डी, और गिल्ली-डंडा और सस्ते बैट और बॉल से खेलने के साथ शुरू होती थी। अब सात साल के बच्चे के हाथ में ही आई फ़ोन देखना कोई ख़ास बात नहीं। आठ साल के बच्चे अगर पोर्न देख चुके हों, तो किसी को ख़ास ताज्जुब नहीं होता। डेनमार्क में तो १२ साल के बच्चों को भी स्कूल में पोर्न दिखाने पर सहमति हो चुकी है!

आप मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सेक्स का अनुभव अकेला ऐसा अनुभव है जिसके दौरान बोझिल विचार प्रक्रिया, या ईगो, जिसे साधारण भाषा में अहंकार कहते हैं, अस्थायी तौर पर निलंबित हो जाता है, पृष्ठभूमि में चला जाता है। उसकी गिरफ्त थोड़ी ढीली पड़ जाती है। ईगो का ख़त्म होना एक क्षणिक पर बहुत गहरे आनंद की अनुभूति पैदा करता है। यदि आप प्रेम में हैं, तो वह क्षण खुद के अहंकार से मुक्त होने का क्षण होता है; ऐसा पल जिसमे आप मुखौटे नहीं पहने होते, जब आप उस चीज़ के साथ होते हैं, जो वास्तविक और ठोस है, यानी कि आपकी देह।

ऑस्ट्रिया का मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड कहता था कि प्रेम तो सेक्स का बस एक संजात है। पर वह पूरी तरह सही नहीं था। प्रेम का एक हिस्सा सेक्स से जुड़ा होता है, पर यह प्रेम की बहुत ही सीमित परिभाषा है। प्रेम किसी विपरीत लिंगी या समलिंगी इंसान के लिए ही नहीं होता। यह पशु-पक्षी, पेड़ पौधों, और ऐसी किसी भी वस्तु के प्रति हो सकता है जिससे आपको कोई भौतिक ‘सुख’ नहीं मिलता। यह एक मानसिक अवस्था है। जब आप इस मानसिक अवस्था में होते हैं तो उसका कोई लक्ष्य, कोई गंतव्य नहीं होता। इस बारे में एक मशहूर शेर है: ‘इक लफ्जे मोहब्बत का इतना सा फ़साना है, सिमटे तो दिले आशिक, फैले तो ज़माना है” । इसका सीधा सा अर्थ है कि प्रेम शुरुआत में किसी एक व्यक्ति के प्रति प्रवाहित हो सकता है, पर उसका विस्तार होता है, और अपने विस्तार में यह समूची सृष्टि को अपने आगोश में ले लेता है।             

अतीत का बोझ और आने वाले कल की फिक्र में फंसा मन कमजोर पड़ जाता है ऐसे मौकों पर। इस तरह के अनुभव का सिर्फ एक ही माध्यम है हमारे पास, और वह है सेक्स। सेक्स के इलाके में मन का प्रवेश ही इसे दूषित कर देता है। अन्यथा कुदरत में, पशु जगत में कहीं भी यह समस्या का कारण नहीं। क्योंकि वहां लगातार सोच विचार में, जोड़ घटाव में फंसा मन नहीं। दुर्भाग्य से इस कुदरती और नैसर्गिक वस्तु को भी हमने अपने हिंसक और क्रूर मन से अपवित्र कर डाला है।

जीवन में सेक्स की संतुलित, सही जगह न ढूंढी जाए तो लिबिडो का वेग आपको बलात्कारी, गे, लेस्बियन और ब्रह्मचारी कुछ भी बना सकता है। इस प्रबल मनोदैहिक ऊर्जा के बारे में सही ढंग से शिक्षित न होने के कई परिणाम हो सकते हैं। जीवन की खौफनाक ऊब से पलायन के रूप में सेक्स के इस्तेमाल ने भी इसे एक जटिल समस्या में बदल दिया है। हमने जिस किसी सहज, स्वाभाविक और नैसर्गिक चीज़ को भी छुआ तो वह हमारे लिए ही ज़हर बन गई है। हमारे हाथों में चमत्कार है ऐसा! लाखों समस्याएं हैं लोगों को सेक्स की वजह से। सेक्सोलोजिस्ट प्रकाश कोठारी मोदी जी से थोड़े ही कम व्यस्त होंगें। चाहे तो पता लगा लें!

एक बात और। जीवन में स्नेह, मित्रता और संवेदनशीलता की रोशनी बढे तो सेक्स की अनावश्यक, झूठी चमक फीकी पड़ने लगती है। फिर सेक्स भी आपके बैठकखाने में बैठा एक मित्र भर होता है। उपद्रव मचाने की उसकी क्षमता अपने आप ही कम होने लगती है, क्योंकि अब आपने ऐसा कुछ ढूंढ लिया है जो इससे ज्यादा कीमती और अर्थपूर्ण है। मैत्री भाव बहुत कीमती होता है सम्बन्ध में। उम्र का एक ऐसा पड़ाव भी देर सबेर आता है जब सेक्स अप्रासंगिक हो जाता है। ऐसे में बस स्नेह और मैत्री बचती है। सम्बन्ध की बुनियाद यही होनी चाहिए। सेक्स की उत्तेजना और उससे मिलने वाले तरह तरह के सुख नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि सौन्दर्य, दैहिक सुख के प्रति असंवेदनशील हो जाएँ, या इच्छाओं का दमन करना शुरू कर दें।

जब कुछ ज्यादा सौन्दर्यपूर्ण, ज्यादा गहरा, ज्यादा नैसर्गिक जीवन में आएगा तो जो कुछ भी अनावश्यक है, बोझिल है, दुःख और द्वंद्व को जन्म देने वाला है, वह खुद बखुद मुरझा जाएगा। प्रेम और स्नेह, मैत्री और प्यार की विराटता के सामने सेक्स एक क्षुद्र चीज़ बन कर अपने कोने में दुबक जाएगा। उसका जीवन में अपना स्थान होगा। बस उतना ही जितना होना चाहिए। न ज्यादा, न कम। थोड़ा इस बारे में सोचें, थोड़ी स्पेस बनायें मन में, तभी तो जीवन में उसका आगमन हो पायेगा जिसकी हमे वास्तव में जरुरत है।

लगे हाथों प्रेम और ईर्ष्या के संबंध को भी देखा जाए। जब कोई आपके प्रिय को हसरत से देख भी ले, उसे पाने के प्रयास में लग जाये, या फिर ‘आपका अपना’ किसी और के लिए कोई सुगबुगाहट अपने दिल में महसूस करे, तो जो जलन होती है, उसे किसी धर्म, दर्शन और साहित्य की औषधि ख़त्म नहीं कर सकती। देर रात गरिष्ठ भोजन करने के बाद सीने में होने वाली कोई भी जलन इसके सामने टिक नहीं सकती। देखते-देखते प्यार का गुलाबजल तेज़ाब में बदल जाता है। पहली मुलाकात का टेडीबेयर एक कटखन्ने चौपाये की तरह नोंचने खसोटने लगता है। तो प्यार क्या छिपी हुई, नकाब पहनी हुई नफरत का नाम है? उसकी कठोर शर्तें होती हैं? जैसे ही लिखित या अलिखित समझौता टूटता है, भीतर का घायल, ईर्ष्या में जलता ऑथेलो चिंघाड़ने लगता है। शायद यही अनुभव आग के दरिया में डूबने जैसा होता होगा। इसी को ग़ालिब ने आग का दरिया कहा होगा! इसमें डूबकर फिर बाहर निकलना प्यार की चुनौती है। सवाल है: क्या प्यार ईर्ष्या है? क्या प्यार लगाव, अटैचमेंट है? इस मोह  के कारण, प्यार की मीठी गोली खिला-खिलाकर हम बच्चों के साथ बड़े धूर्त खेल खेलते हैं। अपनी बातें मनवाने के लिए उन्हें तरह-तरह से झूठी सच्ची कहानियां सुनाते हैं बस इसीलिए कि वे ‘हमारे अपने बच्चे’ बने रहें, भले ही इस ‘प्यार’ के लिए उनको अपनी खुशियों को हलाल करना पड़े।

प्रेम की गति ही विचित्र है। प्यादा वजीर और वजीर को प्यादा बनते देर नहीं लगती इसमें। देखते देखते हबीब रकीब बन जाता है, और रकीब हबीब। जो डूबता है वही उबर जाता है; और जो उबरता है वह तो समझो डूब ही जाता है हमेशा के लिए!

 चलिए अब प्यार की नजाकत की बात भी करें कवि की भाषा में! इस प्रेम पर्व को कोई कवियों की मदद के बगैर कैसे मना सकता है! निज़ार कब्बानी लिखते हैं: प्यार चलता है मेरी त्वचा पर, तुम चलती रहती हो त्वचा पर मेरी/ और मैं, बारिश से घुली गलियों और फुटपाथों को/ लादे फिरता हूँ अपनी पीठ पर, तुम्हारी तलाश में। दुष्यंत कुमार बिलकुल नए अंदाज़ में प्रेम व्यक्त करते हैं: तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा, अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा/ पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है, मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा-भरा। 

और आखिर में…हिंदी साहित्य में प्रेम का एक लोकप्रिय, शाश्वत सुर छेड़ते हैं केदार नाथ सिंह: ‘उसका हाथ, अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा/ दुनिया को, हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए’। मार्टिन रीस ब्रिटेन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक था जब उसने 2003 में ‘आवर फाइनल आर’ नाम की किताब लिखी और इसमें उसने कहा कि यह सदी इंसानियत के लिए आखिरी सदी है। जब ऐसे हालात हों, तो क्या हम सब यह प्रतिज्ञा कर सकते हैं कि दुनिया को अपनी प्रेयसी के हाथ की तरह गर्म और सुन्दर बनाने की कोशिश करेंगें!

प्रेम दिवस पर इससे कीमती वादा क्या हो सकता है इस उदास धरती के साथ! उसके लिए इससे बड़ा तोहफा और कौन सा हो सकता है!