माँ सरस्वती ने इस दिन प्रकट होकर धरती को किया था प्रदान, अनुपन सौंदर्य

 माँ सरस्वती  ने इस दिन प्रकट होकर धरती को किया था  प्रदान, अनुपन सौंदर्य

वाराणसी (रणभेरी): आज सम्पूर्ण देश बसंत पंचमी का पर्व मना रहा हैं, इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा ही धूम-धाम से मनाया जाता है। इस दिन विष्णु और कामदेव की पूजा होती हैं। यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता है। इस सभी ऋतूओ में से वसंत को सभी ऋतूओ का राजा माना जाता है , तथा इसी दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत होती है। 

इस ऋतु में खेतों में फसले लहलहा उठती है और फूल खिलने लगते है एवम् हर जगह खुशहाली नजर आती है तथा धरती पर सोना उगता है अर्थात धरती पर फसल लहलहाती है। मान्यता है कि इस दिन माता सरस्वती का जन्म हुआ था इसलिए बसंत पचमी के दिन सरस्वती माता की विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।  आज हर घरो में तथा  स्कूल ,कोचिंग ,कॉलजे में माया जाता है आज के दिन पीला ,सफ़ेद कपडे पहने का रिवाज़ है माना ये जाता है की माँ सरसवती को पीला रंग बहुत ही पसंद है तथा सफ़ेद रंग सन्ति का प्रतिक माँ सरस्वती को सफ़ेद रंग भी पसंद है। माँ सरस्वती को विद्या एवम् बुद्धि की देवी माना जाता है। बसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती से  विद्या, बुद्धि, कला एवं ज्ञान का वरदान माँगा जाता है।

बसंत पंचमी के ऐतिहासिक महत्व को लेकर यह मान्यता है कि सृष्टि रचियता भगवान ब्रह्मा ने जीवो और मनुष्यों की रचना की थी। ब्रह्मा जी जब सृष्टि की रचना करके उस संसार में देखते हैं तो उन्हें चारों ओर सुनसान निर्जन ही दिखाई देता है एवम् वातावरण बिलकुल शांत लगता है जैसे किसी की वाणी ना हो। उन्हों ने बहुत प्रयास किया की मनुष्य में कोई वाणी आये कठिन प्रयास के बाद भी कुछ नहीं हुआ यह सब करने के बाद भी ब्रह्मा जी मायूस, उदास और संतुष्ट नहीं थे। तब ब्रह्मा जी भगवान् विष्णु जी से अनुमति लेकर अपने कमंडल से जल पृथ्वी पर छिडकते है। 

कमंडल से धरती पर गिरने वाले जल से पृथ्वी पर कंपन होने लगता है और एक अद्भुत शक्ति के रूप में चतुर्भुजी (चार भुजाओं वाली) सुंदर स्त्री प्रकट होती है। उस देवी के एक हाथ में वीणा और दुसरे हाथ में वर मुद्रा होती है बाकी अन्य हाथ में पुस्तक और माला थी। ब्रह्मा जी उस स्त्री से वीणा बजाने का अनुरोध करते है।  देवी के वीणा बजाने से संसार के सभी जीव-जंतुओ को वाणी प्राप्त को जाती है। उस पल के बाद से देवी को “सरस्वती” कहा गया | उस देवी ने वाणी के साथ-साथ विद्या और बुद्धि भी दी इसलिए बसंत पंचमी के दिन घर में सरस्वती की पूजा भी की जाती है। अर्थात दुसरे शब्दों में बसंत पंचमी का दूसरा नाम “सरस्वती ही पूजा” भी है। देवी सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है।