चैतन्य नागर का ब्लॉग: बाय डॉन, स्वागत बाइडन

चैतन्य नागर का ब्लॉग: बाय डॉन, स्वागत बाइडन

जब डॉनल्ड ट्रम्प जैसे राजनीतिक डॉन का मंच से जाना हो, तब ‘जाना’ इतनी खौफनाक क्रिया न होकर एक बहुत ही गहरी राहत की बात बन जाती है। विशेषज्ञों की राय है कि कई राज्यों में मतदान में धोखाधड़ी होने के ट्रम्प के आरोप साबित होने की उम्मीद न के बराबर है। ठीक सामने खड़ी सच्चाई को स्वीकार न करने की ट्रम्प की आदत से उनका देश और विश्व पहले से ही परिचित है। पराजित डॉनल्ड ट्रम्प की चर्बीयुक्त पीठ देखकर समूची दुनिया, यूरोप के कई देशों, मेक्सिको, अमेरिकी अश्वेतों और बड़ी संख्या में महिलाओं ने भी चैन की सांस ली है। अठाईस साल बाद ट्रम्प पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जो दुबारा चुनाव नहीं जीत पाए।

कमला हैरिस की जीत का तो अपना ख़ास महत्व है। पहली दफा एक महिला अमेरिका की उपराष्ट्रपति बनीं हैं, वह भारतीय मूल की हैं, इसलिए भारत को थोड़ा गर्व करना भी बनता है। कमला हैरिस ने कहा है कि अमेरिका के लोगों ने उम्मीद, मर्यादा, विज्ञान और सच को चुना है। वास्तव में ट्रम्प ने इन चारों को ही वाइट हाउस की खूबसूरत खिड़कियों से बाहर फेंक दिया था। बाइडन का यह कहना कि वह समूचे अमेरिका के राष्ट्रपति हैं, यह दिखाता है कि ट्रम्प अमेरिकी चेतना को कई तरह से विभाजित और क्षत-विक्षत करने वाले नेता के रूप में देखे जाते हैं।  

यह भी पढ़ें: मन को समझने में चूक गए थे बापू ? लेखक: चैतन्य नागर 

भारत में डॉनल्ड ट्रम्प के कई मित्र थे और उनकी ख्वाहिश थी कि काश वह एक बार और राष्ट्रपति बन जाते। पर उन्हें अपने डर और आशंकाओं पर फिर से नज़र डालनी चाहिए और आश्वस्त महसूस करना चाहिए क्योंकि कई नीतियां, और ख़ास तौर पर विदेश नीतियां राष्ट्र प्रमुखों के साथ ही बदल नहीं जातीं। वे दशकों के आर्थिक, सामरिक, और अक्सर सांस्कृतिक अनुभवों, अपेक्षाओं और समझ पर आधारित होती हैं। जो लोग सोचते हैं कि ट्रम्प और प्रधान मंत्री मोदी की व्यक्तिगत केमिस्ट्री, टेक्सस और अहमदाबाद के खुशनुमा माहौल, ‘हाउडी मोदी’ और ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ जैसी मेगा इवेंट ही दोनों लोकतान्त्रिक देशों की गहरी मित्रता का आधार थीं, वे गलत हैं।

राजनीतिक संबंधों की बुनावट और विदेश नीतियां नेताओं की निजी दोस्ती और दुश्मनी से बनती-बिगड़ती नहीं। वैसे भी ट्रम्प जाने से पहले यह कह कर कि ‘भारत बहुत ही गंदा है’ अपनी बहुप्रचारित दोस्ती पर पानी फेर गये। सच को भी अप्रिय तरीके से न बोला जाए तो बेहतर होता है, पर यह कला ट्रम्प में कभी विकसित ही नहीं हुई। उनकी हार के बड़े कारणों में उनके ऊटपटांग, भद्दे और अक्सर अश्लील वक्तव्य भी शामिल हैं। वैसे मैं यह भी सोचता हूँ कि ट्रम्प जैसे व्यापारी जो करीब ढाई अरब डॉलर के मालिक हैं, उन्हें राजनीति में आने की आवश्यकता ही क्या पड़ती है।

यह भी पढ़ें: महिलाओं की सुरक्षा को लेकर घिरी योगी सरकार, तमाम वादे निकले खोखले

राजनीति में तो जनता की फिक्र करने वाले लोग होने चाहिए, जिन्हें ज़िंदगी की तकलीफों का सीधा अनुभव हो, पर एक जो इंसान तीस साल की उम्र में ही चौदह हज़ार फ्लैट का मालिक था, वह क्या राजनीति में सिर्फ अपनी सत्ता लोलुपता को, धन से पूरी न हो सकने वाली अतृप्त कामनाओं को ही शांत करने के लिए नहीं आया होगा। अमेरिका के लोगों को यह बात बहुत गहरे तक छू गई है कि बाइडन अपने परिवार के प्रति समर्पित थे, अपने बच्चों को अकेले पालते थे और हर रोज़ तीन सौ कि मी ट्रेन में सफर करते थे जिससे वे सुबह बच्चों के साथ नाश्ता कर सकें, और शाम को उन्हें बिस्तर पर सुला सकें। दूसरी तरफ अब तक छब्बीस महिलाओं ने विवाहित ट्रम्प के खिलाफ सेक्सुअल बदतमीजी की शिकायत की है। अमेरिका के लोग अपने राष्ट्रपतियों के पारिवारिक और व्यक्तिगत जीवन को खूब खंगालते हैं और उनके पारिवारिक जीवन की समरसता और सार्वजानिक जीवन के बीच सीधा संबंध देखते हैं।              

ट्रम्प हार से झुंझला कर भारतीय विपक्षियों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वह ईवीएम तो नहीं पर कई और तरह की धोखाधड़ी को दोष दे रहे हैं, पर वहां के लोग उनकी बात को कितना महत्व देते हैं यह इसी से साबित होता ही कि वहां के टी वी चैनल्स ने इस तरह के बयानों का प्रसार ही रोक दिया! अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों ने यह भी साबित कर दिया कि सत्ता की दौड़ में दुनिया का हर राजनेता कितना एक जैसा होता है! कई मामलों में डॉनल्डव ट्रम्पि की हरकतें किसी सर्कस के जोकर से कम हास्यास्पद नहीं। कोविड-19 से निपटने में नाकामी, इसकी वजह से बढी आर्थिक बदहाली, नस्लीहय-रंगभेदी तनाव, क्लाइमेट और अंतर्राष्ट्री य रिश्तोंढ पर पूछे गए सवालों पर ट्रम्प  का जबाव आमतौर पर सतही, बचकाना, मजाकिया और अक्सर वाहियात ही रहा। अमेरिकी राष्ट्र पति के चुनाव की समूची प्रक्रिया में ट्रम्पत अपने विरोधी जो बाइडन पर फिकरे कसते रहे और छिछोरापन दिखाते रहे। अब तक दो लाख  से अधिक अमेरीकियों की जान लेने वाली कोविड-19 महामारी पर काबू करने की बजाए राष्ट्र पति ट्रम्पल उसकी खिल्ली् उडाते रहे और अपनी शुरुआत की चुनावी रैलियों में बगैर मास्क के दिखाई दिए। बहुत ही अनुभवी वायरस विशेषज्ञ और वैज्ञानिक फाउची का सरे-आम मज़ाक उड़ाया और अपनी एक जन सभा में कहा कि जल्दी ही उन्हें वह हटाएगें। ऐसे क्षणों में ट्रम्प एक दम्भी और उद्दंड राजनेता की असंवेदनशील चेतना को पूरी बेहयाई के साथ जीते हुए दिखते थे।    

यह भी पढ़ें: Lockdown में मयखाना: टूटी तंद्रा, छंट गई धुंध, चातक के कंठ पड़ी स्वाति की बूंद

डेमोक्रेटिक पार्टी के सत्ता में आने के बाद उम्मीद है कि भारत और अमेरिका के बीच सामरिक और आतंकवाद विरोधी सहयोग पहले की तरह ही बना रहेगा। चीन की दुष्टतापूर्ण और आक्रामक आदतों से दोनों ही परेशान हैं इसलिए इस क्षेत्र में दोनों का आपसी सहयोग बढ़ने की संभावनाएं ही अधिक हैं। एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन की आर्थिक और सैन्य दादागिरी को अमेरिका की रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक सरकारों ने खूब समझा है और इसलिए वहां सरकार बदलने से इस मामले में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। चीन से निपटने के लिए भारत का उपयोग हमेशा होता रहेगा, यह तय है। अमेरिका की भारत नीति 2000 के बाद से अधिक नहीं बदली और भविष्य में भी यथावत बनी रहेगी। भारत इस बात से वाकिफ है कि अमेरिका उसकी तरफ से चीन से युद्ध करने नहीं जा रहा, और एक सुपर पॉवर को अपना दोस्त बनाये रखने के फायदे से भारत भी खूब परिचित है।  

ट्रम्प विदेशी मामलों पर एक शुद्ध वाणिज्यिक दृष्टिकोण रखते था। वह हर चीज़ में एक तरह की सौदेबाजी पर जोर देते थे। ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि बाइडन के साथ व्यापारिक संबधों में सरलता आयेगी। दोनों देशों की टेक कंपनियां बाइडन प्रशासन के कारण फायदे में ही रहेंगी। कुछ लोगों का यह मानना है कि जो बाइडन पाकिस्तान की तरफ नरमी दिखा सकते हैं और कश्मीर को लेकर भारत को परेशान कर सकते हैं। पर यह नहीं भूला जाना चाहिए कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान की सेना और वहां के आतंकी गुटों ने जिस तरह अमेरिकी सैनिकों को अपना निशाना बनाया, उससे उसकी पोल अमेरिका के सामने खुल चुकी है। अनुभवी राजनेता बाइडन पाकिस्तानी सेना की नापाक हरकतों से परिचित हैं। जब राष्टपति ओबामा ने ओसामा बिन लादेन के खिलाफ पाकिस्तान के ऐबटाबाद ऑपरेशन का आदेश दिया था, उस समय बाइडन उप-राष्ट्रपति थे। डेमोक्रेट होने की वजह से बाइडन दुनिया में लोकतंत्र और मानवाधिकार के हर वास्तविक या मनगढ़ंत मुद्दे पर अपनी राय तो जरूर व्यक्त करेंगे पर भारत-पाकिस्तान संबंध और कश्मीर के मामले में वे सीधे कोई टांग अड़ाएं इसकी संभावना कम है। और यदि ऐसा उन्होंने किया भी तो भारत हमेशा की तरह अपनी सार्वभौमिकता पर किसी आक्रमण का विरोध भी करेगा।

बाइडन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के उन बयानों को लेकर भी आशंकाएं हैं जो उन्होंने अपने प्रचार के दौरान दिए थे, पर यह बयानबाजी इसलिए भी थी क्योंकि ट्रम्प ने कश्मीर में अनुच्छेद 370 ख़त्म करने और नागरिकता संशोधन कानून पर कोई भारत सरकार विरोधी वक्तव्य नहीं दिया था। बाइडन और कमला हैरिस की जिम्मेदारी थी कि वे इन मुद्दों पर अपनी डेमोक्रेटिक सोच को स्पष्ट करें। गौरतलब है कि भले ही बाइडन स्वयं भारत विरोधी बयानों और नीतियों से परहेज करें, डेमोक्रेटिक पार्टी में एक ऐसा मजबूत गुट जरूर है जो भारत के बारे में बहुत सकारात्मक विचार नहीं रखता और यह हमेशा वाइट हाउस की नीतियों को प्रभावित करने की स्थिति में रहेगा। डेमोक्रेटिक पार्टी का यह वर्ग हर तरह की बहुसंख्यवादी नीतियों और विचारधाराओं का विरोध करेगा और ट्रम्प के विचारों से मिलती-जुलती हर बात की गंभीरता से पड़ताल जरूर करेगा।
कमला हैरिस के अगले चार वर्षों में राष्ट्रपति के पद के लिए चुनाव लड़ने की प्रबल संभावना है। हो सकता है कि बाइडन अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उनको राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव रखें, क्योंकि वे इस तरह का संकेत वह पहले ही दे चुके हैं। लोगों को उम्मीद है कि ‘अमेरिका सबसे आगे’ जैसी लोकलुभावनवादी बातों की जगह अब एक वैश्विक अमेरिकी नेतृत्व उभर कर सामने आएगा, जो संसार की चुनौतियों से निपटने के लिए बहुपक्षीय रवैया अपनाएगा।

क्लाइमेट परिवर्तन संबंधी कई सकारात्मक कार्यों की उम्मीद बाइडन प्रशासन से है क्योंकि ट्रम्प ने पर्यावरण संबंधी ओबोमा प्रशासन की कई नीतियों को गलत तरीके से बदल डाला था। क्लाइमेट परिवर्तन संबंधी पेरिस समझौते में अमेरिका की वापसी की उम्मीद धरती की आबोहवा के लिए उम्मीद जगाती है। बाइडन कह चुके हैं कि उनका प्रशासन ठीक सतहत्तर दिन के बाद पेरिस क्लाइमेट समझौते में फिर से शामिल हो जायेगा। सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी की प्रबल उपस्थिति में वह पर्यावरण के प्रति अपनी फिक्र को कैसे व्यक्त करते हैं, इसकी प्रतीक्षा दुनिया को रहेगी। साथ ही वह विश्व स्वास्थ्य संगठन से बाहर होने के ट्रम्प के फैसले को बदलते हुए उसमें फिर से शामिल होने का अपना वादा बाइडन राष्ट्रपति बनने के साथ ही पूरा करेंगे, इसकी भी पूरी उम्मीद है।